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ज्योतिष विद्या के अनुसार इस दुनिया में मुख्या स्थान नॊ ग्रहो का है। जो की आप जानते होंगे। उन नो ग्रहो में से "केतु ग्रह" भी है।
और इस ग्रह का प्रबल प्रभाव इन्सान को पढ़ाई और आध्यात्मिक छेत्र में बड़ी सफलता दिलाता है। परन्तु कई इन्सान बृस्पति ग्रह के सुभ फल देने में सहायता करता है। किन्तु 'गुरु' तथा 'केतु' के प्रभाव वाले इंसानो में बहुत ज्यादा अंतर पाया जाता है। गुरु के प्रकोप वाले जातक अपनी आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ रिस्ते-नाते और जिमेदारी का पालन करते है ,जबकि केतु के प्रकोप वाले इंसान /जातक सब कुछ भुला कर केवल अपने आध्यात्मिक जीवन की तरफ ज्यादा से ज्यादा ध्यान देता है।
केतु ग्रह भी राहु ग्रह की तरह एक छाया ग्रह होता है। इन्सान के शरीर में केतु ग्रह मुख्य रूप से अग्नि देव तत्त्व का प्रतिनिदित्य करता है। ज्योतिष विद्या में केतु ग्रह को दो तरह का माना जाता है - नपुसंक ग्रह और नर ग्रह।
केतु ग्रह का स्वाभाव मंगल ग्रह की तरह क्रूर यथार्थ ग़ुस्से वाला होता है। ऐसी कारण से मंगल ग्रह की दृष्टि में आने वाले जातको का लेख-जोखा कई बार केतु ग्रह करता है।
जब किसी इन्सान की कुंडली में केतु का स्थान विशेष तथा किसी बुरे ग्रह की दृष्टि के कारण बलवान हाने पर इन्सान को मानसिक रोग और बाहरी बधायो से पीड़ित होते है। और केतु के असुभ होने पर जातक का कोई अंग किसी दुर्घटना या फिर लड़ाई / झगडे में भांग हो सकता है।
इन्सान की कुंडली में केतु ग्रह पर किसी बुरे ग्रह का विशेष प्रभाव जातक को पैरो का दर्द या कानो का दर्द और शरीर पर किसी तेज धार वाले हथियार से हमला होने की सम्भावना बानी रहती है।
और इसका प्रभाव इन्सान को जीवन भर एक शहर से दूसरे शहर और एक देश से दूसरे देश में बटकने पर मजबूर कर देता है। ऐसे इन्सान आपने पुरे जीवन में कही पर भी एक जगह टिक नहीं पते है और भटकते रहते है।
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अगर कोई इन्सान केतु की महादशा से पीड़ित है ,तो इसके उपाय के तोर पर -
* लकड़ी के चार टुकड़े चार दिन तक बहते हुए पानी में प्रवाहित करे।
* कन्यायो को भोजन क्लवकार दक्षिन सहित विदा करना चाहिए।
* इन्सान को गरीबो,ब्रम्हानो और जरूरतमंद लोगो को कंभल दान करनी चाहिए।
* इन्सान को हमेशा गणपति देव की पूजा करनी चाहिए और लड्डु का भोग लगाना चाहिए।
* इन्सान को बहते जल में कोयले के २१ टुकड़े प्रवाहित करना चाहिए।
* धाये हाथ की माध्यम ऊँगली में लहसुनिया चाँदी में विदिपूर्व धारण करना चाहिए।
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